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- तुगलकी फरमानों' ने बढ़ाया पेंशनर्स का बीपी
- इलाज के लिए दवाओं से ज्यादा दस्तावेजों की दरकार
भीलवाड़ा लोकजीवन। राजस्थान गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम जिसे कभी प्रदेश के लाखों पेंशनर्स के लिए 'संजीवनी' माना गया था, अब वही योजना बुजुर्गों के लिए 'सिरदर्द' बन चुकी है। स्वास्थ्य विभाग और सरकार के नए 'तुगलकी फरमानों' ने उन बुजुर्गों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं, जिन्हें इस उम्र में शांति और सुलभ चिकित्सा की सबसे ज्यादा जरूरत थी। पेंशनर्स का आरोप है कि सरकार ने इलाज को इतना जटिल बना दिया है कि अब अस्पताल जाना किसी मानसिक प्रताड़ना से कम नहीं है।
पिछला बिल दिखाओ, तब अगली दवा पाओ!
विभाग के हालिया आदेश ने बुजुर्गों की मुश्किलें सौ गुना बढ़ा दी हैं। अब अस्पताल में नई पर्ची कटवाने से पहले पिछली बार ली गई दवाओं का बिल दिखाना अनिवार्य कर दिया गया है। सवाल यह है कि 75-80 साल की उम्र के बुजुर्ग, जो ठीक से चल नहीं पाते या जिनकी आंखों की रोशनी धुंधली हो चुकी है, वे इन कागजों को संभालकर कैसे रखें? क्या सरकार उन्हें मरीज के बजाय एक रिकॉर्ड कीपर बनाना चाहती है?
2000 रुपए की 'लक्ष्मण रेखा': पीएमओ के दफ्तर की चौखट पर दम तोड़ती उम्मीदें
सबसे ज्यादा आक्रोश दवाओं की लिमिट को लेकर है। नए नियम के अनुसार, यदि किसी गंभीर बीमारी की दवा का खर्च महीने में 2000 रुपए से अधिक होता है, तो उसके लिए प्रमुख चिकित्सा अधिकारी से पूर्व अनुमोदन लेना होगा।
शुगर, हार्ट और किडनी की दवाएं 2000 रुपए हफ्ते की
"गंभीर बीमारियों जैसे शुगर, हार्ट और किडनी की दवाएं तो हफ्ते भर में ही 2000 का आंकड़ा पार कर जाती हैं। ऐसे में पेंशनर्स पीएमओ के दस्तखत के लिए लंबी कतारों में अपनी बारी का इंतजार करेंगे? क्या उनकी बीमारी साहब के दस्तखत की मोहताज रहेगी?"
सिस्टम की पेचीदगी या बुजुर्गों का अपमान?
भीलवाड़ा के पेंशनर्स संगठनों ने इस सिस्टम को बुजुर्गों के सम्मान के खिलाफ बताया है। उनका कहना है कि जीवनभर सरकार की सेवा करने के बाद, अंतिम पड़ाव पर उन्हें चंद रुपयों की दवाओं के लिए दफ्तरों के चक्कर कटवाना संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। यह नियम न केवल अव्यावहारिक हैं, बल्कि बुजुर्गों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ भी हैं।
चेतावनी: अब सड़कों पर उतरेगा 'अनुभवी आक्रोश'
पेंशनर्स ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अब चुप बैठने वाले नहीं हैं। यदि इन 'कागजी बेड़ियों' और जटिल नियमों को तुरंत वापस नहीं लिया गया, तो पूरे प्रदेश में उग्र आंदोलन किया जाएगा। पेंशनर्स का कहना है कि अगर सरकार को बजट बचाना है तो अन्य फिजूलखर्ची रोके, बुजुर्गों की दवाइयों पर कैंची चलाना बंद करे। सरकार को समझना होगा कि हेल्थ स्कीम का मकसद राहत देना होता है, आफत खड़ी करना नहीं। डिजिटल इंडिया के दौर में अगर बुजुर्गों को रसीदों के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है, तो यह सिस्टम की सबसे बड़ी नाकामी है। सरकार को इन नियमों पर पुनर्विचार कर 'सरल प्रक्रिया' अपनानी चाहिए।
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